نوکر ، مزدور اور کسان (کمّی کمین) کی اہمیت
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1.نوکر - اگر نوکر نہ ہو تو سارے اشرافیہ ذلیل ہو جائیں انہیں خود کھانا پکانا پڑے ، جھاڑو لگانی پڑے ، گھر کی صفائی کرنی پڑے ، اپنے کپڑے خود دھونے پڑیں، گھر کا سودا سامان خود لانا پڑے ، اپنی گاڑی خود ڈرائیو کرنی پڑے اور دفاتر میں بھی سارے کام خود ہی کرنے پڑیں جو کہ ناممکن ہے یعنی نوکر کے بغیر صاحب خود نوکر بن جائیں گے ۔
2. مزدور - اگر معاشرے سے مزدور کو نکال دیا جائے تو دنیا کی ساری معیشت تباہ ہو جائے ، کارخانے بند ہو جائیں ، تعمیرات ہونا رک جائیں ، صاحب لوگوں کو اپنا بوجھ خود اپنے کندھوں پر اٹھانا پڑے ، آمد و رفت رک جائے ، ٹرانسپورٹ بند ہو جائیں ، گھر بننا بند ہوجائیں لوگ غاروں میں رہنا شروع کردیں اگر گھر ہیں تو لوگ گھروں میں محصور ہو جائیں ، ضرورت اور روز مرہ کی اشیاء ملنا ناممکن ہو جائیں ، کپڑے بننا بند ہوجائیں لوگ اگھاڑے پھرنے پر مجبور ہو جائیں ، کھانا پانی تک ملنا محال ہو جائے اور دنیا کی ترقی مکمل طور پر رک جائے اور دنیا قدیم پتھر کے زمانے میں پہنچ جائے ۔
3. کسان - اگر دنیا سے کسانوں کو ختم کر دیا جائے تو ہر قسم کا اناج ، گندم ، چاول ، پھل ، سبزی ، ہر قسم کا تیل ، اور طرح طرح کی کھانے کی نعمتیں ملنا بند ہوجائیں ، کپاس اگنا بند ہو جائے گی تو کپڑے بننا اور اپنا تن ڈھانپنا بھی ناممکن ہو جائے گا یعنی قدیم زمانے کے لوگوں کی طرح لوگ اپنا جسم پتوں سے اور جانوروں کی کھالوں سے ڈھانپنے پر مجبور ہو جائیں گے ۔
بالفاظ دیگر اگر دنیا سے ان پسے ہوئے تینوں گھٹیا طبقات ( شودر ، دلت ، کمّی اور کمین سمجھے جانے والے) کو نکال دیا جائے تو پوری دنیا ہی کمّی کمین اور شودر بن جائے گی ۔ اور دینا کے عیاش حکمرانوں کی حکمرانی ختم ہو جائے گی۔
کیا خیال ہے آپ کا یہ گھٹیا سمجھے جانے والے لوگ دنیا کی بقا اور سلامتی کے لیے کس قدر ضروری ہیں ؟
خیر اندیش - غلام محمد وامِق

नौकर, मजदूर और किसान (कम्मी कमीन) की अहमियत
1. नौकर - अगर नौकर न हो तो सारे अशराफिया ज़लील हो जाएं उन्हें खुद खाना पकाना पड़े, झाड़ू लगानी पड़े, घर की सफाई करनी पड़े, अपने कपड़े खुद धोने पड़ें, घर का सौदा सामान खुद लाना पड़े, अपनी गाड़ी खुद ड्राइव करनी पड़े और दफ़ातर में भी सारे काम खुद ही करने पड़ें जो कि नामुमकिन है यानी नौकर के बगैर साहब खुद नौकर बन जाएंगे।
2. मजदूर - अगर मुआशरे (समाज) से मजदूर को निकाल दिया जाए तो दुनिया की सारी मयीशत (अर्थव्यवस्था) तबाह हो जाए, कारखाने बंद हो जाएं, तामीरात (निर्माण) होना रुक जाएं, साहब लोगों को अपना बोझ खुद अपने कंधों पर उठाना पड़े, आमद-ओ-रफ्त रुक जाए, ट्रांसपोर्ट बंद हो जाएं, घर बनना बंद हो जाएं लोग ग़ारों (गुफ़ाओं) में रहना शुरू कर दें अगर घर हैं तो लोग घरों में महसूर (कैद) हो जाएं, ज़रूरत और रोज़मर्रा की अशिया (वस्तुएं) मिलना नामुमकिन हो जाएं, कपड़े बनना बंद हो जाएं लोग उघाड़े (नग्न) फिरने पर मजबूर हो जाएं, खाना पानी तक मिलना महाल (मुश्किल) हो जाए और दुनिया की तरक्की मुकम्मल तौर पर रुक जाए और दुनिया कदीम (प्राचीन) पत्थर के ज़माने में पहुंच जाए।
3. किसान - अगर दुनिया से किसानों को खत्म कर दिया जाए तो हर किस्म का अनाज, गंदम (गेहूं), चावल, फल, सब्जी, हर किस्म का तेल, और तरह-तरह की खाने की नेमतें मिलना बंद हो जाएं, कपास उगना बंद हो जाएगी तो कपड़े बनना और अपना तन ढांपना भी नामुमकिन हो जाएगा यानी कदीम ज़माने के लोगों की तरह लोग अपना जिस्म पत्तों से और जानवरों की खालों से ढांपने पर मजबूर हो जाएंगे।
बिल्फाज़-ए-दीगर (दूसरे शब्दों में) अगर दुनिया से इन पिसे हुए तीनों घटिया तबकात (शूद्र, दलित, कम्मी और कमीन समझे जाने वाले) को निकाल दिया जाए तो पूरी दुनिया ही कम्मी कमीन और शूद्र बन जाएगी। और दुनिया के अय्याश हुक्मरानों की हुक्मरानी खत्म हो जाएगी।
क्या ख्याल है आपका यह घटिया समझे जाने वाले लोग दुनिया की बका (अस्तित्व) और सलामती के लिए किस कदर ज़रूरी हैं?
खैर अंदेश - गुलाम मोहम्मद वामिक़ पाकिस्तान ( सिंध )
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